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	<title>ADR Speaks &#187; Bihar Elections 2020</title>
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	<description>The ADR Blog</description>
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		<title>करप्शन का बैरोमीटर:भ्रष्टाचार में हम एशिया में नंबर वन! कैसे मिलेगी इस बीमारी से मुक्ति?</title>
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		<pubDate>Wed, 16 Dec 2020 12:49:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Prof. Trilochan Sastry]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Reports]]></category>
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		<description><![CDATA[ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट &#8220;ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर फॉर एशिया&#8217; के अनुसार भ्रष्टाचार के मामले में भारत अब एशिया में शीर्ष पर है। इस रिपोर्ट के अनुसार करीब 50 फीसदी लोगों को अपना काम निकलवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी। इनमें से 63 फीसदी ने इस डर से काई शिकायत भी नहीं की कि इससे [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p class="">ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट &#8220;ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर फॉर एशिया&#8217; के अनुसार भ्रष्टाचार के मामले में भारत अब एशिया में शीर्ष पर है। इस रिपोर्ट के अनुसार करीब 50 फीसदी लोगों को अपना काम निकलवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी। इनमें से 63 फीसदी ने इस डर से काई शिकायत भी नहीं की कि इससे उन्हें कहीं बाद में कोई परेशान ना करे। इस रिपोर्ट के अनुसार करीब आधी आबादी अपने संपर्कों या जुगाड़ से काम निकलवाने में भरोसा रखती है। यह भी एक तरह का भ्रष्टाचार ही है और इससे सिस्टम में भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलता है। भ्रष्टाचार के मामले में भारत और चीन की स्थिति बराबर की रही है, लेकिन जहां चीन ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया है, वहीं पिछले साल की तुलना में भारत की स्थिति और भी बदतर हुई है।</p>
<p class=""><strong>ताकतवर ही सबसे भ्रष्ट &#8230;!</strong></p>
<p class="">हमारे यहां सबसे शक्तिशाली समूह राजनीतिज्ञों का है। भ्रष्टाचार जैसी बीमारी को दूर करने का काम केवल राजनैतिक इच्छाशक्ति से ही हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर हमारा राजनीतिक सिस्टम इसमें पहल क्यों नहीं करता? इसका जवाब इन आंकड़ों में है : हमारे यहां दागी सांसदों की संख्या जहां 2004 में 43 प्रतिशत थी, वहीं यह 2019 में बढ़कर 43 फीसदी हो गई। इनमें भी सबसे ज्यादा संख्या सत्ताधारी पार्टी में है। हाल ही में बिहार में हुए चुनाव में दागी विधायकों की संख्या में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2015 में जहां चुने हुए विधायकों में से 58 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज थे, वहीं 2020 में यह संख्या बढ़कर 68 फीसदी हो गई। हमारे जनप्रतिनिधियों के दागी होने का मतलब यही है कि जब उनका दामन साफ नहीं होगा तो वे भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास क्यों करेंगे, क्योंकि व्यवस्था में भ्रष्टाचार ही इन्हें अपने कारनामों को ढंकने मंे मदद करता है।</p>
<p class=""><strong>तो नागरिक क्या कर सकते हैं?</strong></p>
<p class="">&#8220;ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर&#8217; रिपोर्ट कहती हैं कि हमारे यहां 46 फीसदी लोगों ने अपने संपर्कों के जरिए अपने काम करवाए। इनमें से अधिकांश काम छोटे-बड़े नेताओं के जरिए ही करवाए जाते हैं। अगर ये नेता मदद नहीं करते तो उस काम के लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ती। यानी यहां लोगों को यह समझने की जरूरत है कि राजनीतिज्ञ इतने शक्तिशाली हैं कि अगर वे चाहें तो वे पूरे सिस्टम को बदल सकते हैं। अब यह आम नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे नेता ही ऐसे चुनेें जिनकी ईमानदारी और निष्ठा तमाम सवालों से परे हो। अगर राजनीति ईमानदार होगी तो नौकरशाही को अपने आप ईमानदार होना होगा। शीर्ष नौकरशाह जब ईमानदार होंगे तो निचले स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारी भ्रष्टाचार करने का साहस नहीं कर पाएंगे। जब नेता ईमानदार होगा, अफसर ईमानदार होंगे, कर्मचारी ईमानदार होंगे तो आम लोगों में भी वे लोग जो अपने गलत काम भी पैसे देकर या जुगाड़ से करवा लेते हैं, उनके लिए यह सबकुछ इतना आसान नहीं रह जाएगा।</p>
<p class=""><strong>लेकिन यह होगा कैसे?</strong></p>
<p class="">जनता ईमानदार नेता चुनें, यह कहना आसान है, लेकिन करना मुश्किल। इसके लिए हमें कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे। इलेक्टोरल बॉड्स को बंद करके राजनीतिक दलों को होने वाली फंडिंग में पारदर्शिता लानी होगी। आपराधिक रिकॉर्ड वाले लागों को चुनाव का टिकट देने पर रोक लगानी होगी और किसी दागी को टिकट देने पर संबंधित राजनीतिक दल के मुखिया को जिम्मेदार ठहराना होगा। इसके लिए सिविल सोसाइटी का दबाव बनाना होगा और जब भी जरूरत हो, कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से भी नहीं पीछे नहीं रहना होगा। इसके लिए मीडिया को भी अहम भूमिका निभानी होगी।</p>
<p class=""><strong>कहां है समस्या?</strong></p>
<p class="">- कुछ साल पहले एक जाने-माने राजनेता ने कहा था कि चुनावी फंडिंग ही भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी गंगोत्री है। इससे निबटने के लिए सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड्स लेकर आई, लेकिन इसने तो चुनावी फंडिंग को और भी अस्पष्ट और अपारदर्शी बना दिया है। दरअसल, हमारे राजनीतिज्ञ राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बिल्कुल नहीं चाहते। यह बात कुछ कारपोरेट्स हाउसेस को भी रास आती है, क्योंकि इससे वे बड़ी आसानी से राजनीतिक दलों को पैसा दे देते हैं और चुनावों के बाद सरकार से बेजा फायदा उठाते हैं।</p>
<p class="">- भ्रष्टाचार से निबटने के लिए हमें प्रभावी सीबीआई, सीवीसी और एंटी करप्शन ब्यूरो चाहिए। लेकिन इन सभी विभागों का मूल संगठन यानी पुलिस के बारे में आम धारणा यही है कि यह सबसे भ्रष्ट विभाग है। इसलिए हम पुलिस से और प्रकारांतर में इन तमाम संगठनों से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि ये भ्रष्टाचार को मिटाने में कारगर रहेंगे, जब तक कि इनके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं होगी।</p>
<p class="">- सरकारी सेवकों को भी जवाबदेह नहीं बनाया गया है। सरकारी शिक्षक स्कूल नहीं जाते हैं या जाते हैं तो पढ़ाते नहीं। डॉक्टर सरकारी हास्पिटल या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं जाते। अस्पतालों में दवाइयां नहीं मिलती। सड़के, जलापूर्ति, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति अक्सर खराब मिलती है। और दुर्भाग्य से किसी को भी खराब काम करने या जिम्मेदारी न निभाने पर नौकरी से नहीं निकाला जाता। समस्या यह है कि अच्छा काम करने वाले को पुरस्कार भी नहीं मिलता। तो अच्छा काम करने की प्रेरणा भी नहीं मिलती।</p>
<p class=""><strong>केरल और बिहार के सबक &#8230;</strong></p>
<p class="">एक रिपोर्ट के अनुसर केरल में केवल 10 फीसदी नागरिकों को अपने काम करवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी, जबकि बिहार में 75 फीसदी लोगों को। आखिर ऐसा क्यों है, इसको लेकर तो व्यापक अध्ययन की जरूरत है, लेकिन इसमें कहीं न कहीं शिक्षा और साक्षरता का योगदान तो नजर आता ही है। केरल भारत का सबसे साक्षर प्रदेश है, जबकि बिहार का नाम साक्षरता के मामले में नीचे से शीर्ष के राज्यों में शुमार होता है।</p>
<p class="">
<p class=""><em>Originally published in <a href="https://www.bhaskar.com/magazine/rasrang/news/we-number-one-in-asia-in-corruption-how-to-get-rid-of-this-disease-128002146.html">Dainik Bhaskar</a>.</em></p>
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		<title>वोट बहिष्कार के आगे और &#8216;नोटा&#8217; में समाधान ढूंढ़ना होगा</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Sep 2020 10:07:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Rajiv Kumar]]></dc:creator>
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		<category><![CDATA[Bihar Elections 2020]]></category>
		<category><![CDATA[Politicians]]></category>
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		<category><![CDATA[नोटा]]></category>
		<category><![CDATA[वोट]]></category>

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		<description><![CDATA[बिहार के लक्खीसराय अंतर्गत कई गांवों के लोगों को गर्मी के दिनों में कई किलोमीटर दूर से पेयजल ढो कर लाना पड़ता है। चार सौ घरों के मझियांवा में बारह सौ मतदाता हैं, जो पिछले लोकसभा चुनाव में आज़ादी के बाद मिले सबसे बड़े और क्रांतिकारी वोट के अधिकार का बहिष्कार कर दिया, लेकिन उनकी [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>बिहार के लक्खीसराय अंतर्गत कई गांवों के लोगों को गर्मी के दिनों में कई किलोमीटर दूर से पेयजल ढो कर लाना पड़ता है। चार सौ घरों के मझियांवा में बारह सौ मतदाता हैं, जो पिछले लोकसभा चुनाव में आज़ादी के बाद मिले सबसे बड़े और क्रांतिकारी वोट के अधिकार का बहिष्कार कर दिया, लेकिन उनकी मांगे देश की आज़ादी के बीते 74 वर्षों में पूरी नहीं हो पाई। आज भी उनके लिए पेयजल जीवन ही सबसे बड़ी हसरत है। बिहार के चुनाव में नक्सली संगठनों द्वारा वोट बहिष्कार की पुरानी परम्परा रही है। नक्सल प्रभाव वाले इलाकों में इसका प्रभाव भी दिखता था, लेकिन आज़ादी के 66 वर्षों के बाद अमोघ अस्त्र के रूप में &#8216;नोटा&#8217; मिला है, किन्तु लोकतंत्र के सफर में हम आज जीवन की नैसर्गिक जरूरतों को पूरा करने के लिए &#8220;नोटा&#8221; के प्रयोग के आगे कुछ भी सोच पाने में असमर्थ  साबित हो रहे हैं। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है।  नोटा के अस्तित्व में आने के पीछे यही दर्शन रहा है। भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण फैंसला 27 सितम्बर 2013 को उस समय सामने आया जब सर्वोच्च न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) द्वारा दाखिल की गयी एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए भारत के निर्वाचन आयोग को आदेश दिया कि वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में उपरोक्त में से कोई नहीं (नोटा) का बटन लगाये ताकि जो मतदाता चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में से किसी को भी वोट न देना चाहते हो वह अपना वोट गोपनीयता बनाये रखते हुए अपने विकल्प का इस्तेमाल कर सके।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>2019 के लोक सभा में एक तिहाई सीटों पर आठ लाख से अधिक वोट मिले। सबसे अधिक जहानाबाद में 27 हज़ार 683 बार नोटा बटन दबा जहानाबाद में। &#8216;नोटा&#8217; ने जहानाबाद के चुनावी नतीजों को प्रभावित किया। इस सीट पर हार जीत का अंतर महज 1751 वोटों का है, जबकि यहाँ नोटा को 27 हज़ार 683 मत मिले। देश भर में लोक सभा की कई सीटें ऐसी रही जहां पर जीत का अंतर नोटा को मिले वोटों से भी कम रहा। करीब दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर प्रत्याशियों को नोटा की वजह से हार झेलनी पड़ी। भारत 2014 से भारत में नोटा को अपनाया गया। पहली बार 15 लाख से ज्यादा वोट नोटा को आया था। 16 वीं बिहार विधानसभा के लिए चुनाव में नोटा का जबरदस्त प्रभाव देखा गया। इसने 23 सीटों पर सीधे तौर पर परिणाम को प्रभावित किया। इन 23 सीटों पर जितने मतों के अंतर से जीत हासिल हुई। उससे कही अधिक नोटा के पक्ष में बटन दबे। यह चुनाव इस मायनों में भी रहा क्योंकि मतदाताओं  ने कई पार्टियों की तुलना में नोटा को ज्यादा वोट दिया।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>नोटा के तहत होना यह चाहिए कि नोटा को यदि चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में यदि सबसे अधिक मत नोटा को मिले तो वह चुनाव रद्द हो जाना चाहिए। उसके बाद पुनः चुनाव करवाए जाने चाहिए जिसमें पूर्व में खड़े उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। यानि पुनः नये उम्मीदवारों के साथ पुनर्मतदान कराये जाने चाहिए। नोटा भारत में नकारात्मक फीडबैक देने का काम करने लगा है, अब कुछ राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि भी नोटा को लेकर नकारात्मक माहौल बनाने में लगे हुए है या इसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर रहे है जो बिलकुल ही लोकतंत्र की अवधारणाओं की विरुद्ध है। हाल में महाराष्ट्र और हरियाणा स्टेट इलेक्शन कमीशन की पहलकदमी से नोटा के प्रति भरोसा जगा है। 6 नवंबर &#8211; 2018 को महाराष्ट्र में स्टेट इलेक्शन कमीशन ने एक ऑर्डर पास किया है कि नोटा को यदि बहुमत मिल जाता है तो पुनर्मतदान कराया जाएगा। 22 नवंबर &#8211; 18 को हरियाणा स्टेट इलेक्शन कमीशन ने भी यही निर्णय लिया। इसकी एक वजह थी कि महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में कई ऐसी सीटें थी जिसमें नोटा को बहुमत मिला था। पुणे के एक पंचायत में नोटा को 85 प्रतिशत वोट मिल गया। यही ऑर्डर यदि देश व्यापी हो जाए तो उम्मीद है देश में नोटा की प्रासंगिकता बढ़ जाएगी और वोट बहिष्कार की धारा को भी मुकाम मिल जाएगा।</p>
<pre id="tw-target-text" class="tw-data-text tw-text-large XcVN5d tw-ta" dir="ltr" data-placeholder="Translation"><span lang="hi">मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित</span></pre>
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		<title>क्या आय के स्रोतों के खुलासे से राजनीति में आ पाएगी शुचिता ?</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Sep 2020 11:21:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Rajiv Kumar]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[चुनाव प्रक्रिया में सुधार एवं राजनीति में शुचिता के लिए उच्चतम न्यायालय ने पिछले दिनों एक ऐतिहासिक व अहम फैंसला सुनाया था। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सांसद एवं विधायकों की संपत्ति इतनी कैसे बढ़ जाती है ? यह जनता को जानने का अधिकार है। फैंसले के मुताबिक उम्मीदवारों [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>चुनाव प्रक्रिया में सुधार एवं राजनीति में शुचिता के लिए उच्चतम न्यायालय ने पिछले दिनों एक ऐतिहासिक व अहम फैंसला सुनाया था। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सांसद एवं विधायकों की संपत्ति इतनी कैसे बढ़ जाती है ? यह जनता को जानने का अधिकार है। फैंसले के मुताबिक उम्मीदवारों को अब स्वयं, पत्नी और आश्रितों की संपत्ति के साथ आय का स्रोत भी बताना आवश्यक हो जाएगा। फैंसला के तहत अब से नामांकन परची में एक कॉलम होगा जिसमें आश्रितों की कमाई के स्रोतों को भी दर्शाना होगा। अब वे चल &#8211; अचल संपत्ति के साथ ही अपने तथा अपने आश्रितों के आय के स्रोतों का भी उल्लेख करेंगे। साथ ही पिछले पांच वर्षों में कुल आय को वर्ष वार दर्शाना भी आवश्यक हो जाएगा। चुनाव आयोग को यह जानकारी देनी होगी कि उन्हें या उनके आश्रितों के किसी सदस्य की कंपनी को कोई सरकारी टेंडर मिला है या नहीं। यह व्यवस्था अब लोकसभा, राज्य सभा एवं अगले बिहार विधानसभा के साथ पंचायत के चुनाव में भी लागू होगा।</p>
<p>2014 के लोक सभा चुनाव में एडीआर द्वारा उम्मीदवारों के हलफनामों के विश्लेषण के अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि 113 सांसदों की संपत्ति में सौ गुणा, 26 सांसदों की संपत्ति में पांच सौ गुणा वृद्धि हुई है। इनमें 113 सांसदों ने अपना पेशा बतौर समाज सेवा, राजनीति एवं सामाजिक कार्य बताया था। आश्रितों में आठ की पत्नियां गृहिणी थी, लेकिन उनकी संपत्ति करोड़ों में थी। जाहिर है ये सभी आय के स्रोत नहीं हो सकते है। बिहार इलेक्शन वॉच के अध्ययन का भी हवाला दिया जा सकता है कि पिछले विधानसभा में निर्वाचित विधायकों की संपत्ति से उनके आश्रितों की संपत्ति पचास प्रतिशत से अधिक थी। 2015 के विधानसभा में यह भी देखने को मिला कि 43 विधानसभा सदस्यों की पत्नियों की संपत्ति में पचास प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गयी। एक विधायक की संपत्ति दो लाख थी वही उनके आश्रित एक करोड़ के स्वामी थे। यानी आश्रितों की संपत्ति में 97.87 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। इस क्रम में 43 ऐसे माननीय है जिनकी संपत्ति अपने आश्रितों से भी कम है यानी समाज सेवा के नाम पर राजनीति कर रहे विधानसभा सदस्यों को अपने आश्रितों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। याचिका कर्ता का यह कहना है कि अब जनता को अपने प्रतिनिधियों को पकड़ना आसान हो जाएगा कि उनकी संपत्ति पिछले कुछ सालों में कितनी बढ़ गई है और उसके आय के जायज स्रोत क्या है ? मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि आखिर इनकी संपत्ति दिन &#8211; दूनी रात चौगुनी कैसे बढ़ रही है। अदालत के आदेश के तहत उम्मीदवारों को न सिर्फ अपनी आय के स्रोत बताने होंगे बल्कि अपनी पत्नी, बेटा, बहु, बेटी दामाद की आय के साथ उनके स्रोत की भी घोषणा करनी होगी।  सर्वविदित है कि बेहिसाब संपत्ति की घोषणा करने के साथ ही यह गोपनीय रहा करता था कि उनकी बेहिसाब संपत्ति का आखिर स्रोत क्या है ? गौर करने वाली बात है कि कमोबेश चुनावों में सभी उम्मीदवारों के द्वारा समाज सेवा या राजनीति को बतौर पेशा बताया जाता है। आखिर राजनीति या समाज सेवा कोई पेशा नहीं होता तो फिर उनकी अकूत संपत्ति का राज आमलोगों को समझ में नहीं आ पाता है ? किसी भी सांसद या विधायक के आय से अधिक संपत्ति माफिया राज को रास्ता माना जाता है। जिसका असर राजनेताओं के भ्रष्टाचार पर पड़ता है।</p>
<p>ऐसा देखा जा रहा है कि अपने परिजनों के नाम पर ऐसे राजनेता कई पीढ़ियों के लिए बेहिसाब संपत्ति बना लेते है वही दूसरी ओर गरीब जनता की सेहत में सालों कोई परिवर्तन नहीं आ पाता। इन माननीयों की संपत्ति और आय के अंर्तसंबन्धों को समझने के लिए 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में 160 ऐसे उम्मीदवारों की आय का विश्लेषण किया गया जिनकी 2010 में संपत्ति 84.41 लाख थी, लेकिन 2015 में उनकी संपत्ति में औसतन 199 प्रतिशत वृद्धि देखी गयी यानि औसतन 2.57 लाख। इन पांच सालों में 1.71 करोड़ वृद्धि हुई। इनमें पांच ऐसे नाम है जिनकी संपत्ति 553 प्रतिशत, 480 प्रतिशत, 354 प्रतिशत, 279 प्रतिशत और 210 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गयी। विधानसभा के साथ लोकसभा, राज्य सभा एवं प्रदेश के सर्वोच्च पदों पर आसीन राजनेताओं की स्थिति कमोबेश समान ही देखी गयी है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<pre id="tw-target-text" class="tw-data-text tw-text-large XcVN5d tw-ta" dir="ltr" data-placeholder="Translation"><span lang="hi">मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित!</span></pre>
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