<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>ADR Speaks &#187; राजनीतिक पार्टियों</title>
	<atom:link href="https://blog.adr.cramat.in/tag/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://blog.adr.cramat.in</link>
	<description>The ADR Blog</description>
	<lastBuildDate>Thu, 09 Mar 2023 05:48:35 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=4.1.41</generator>
	<item>
		<title>राजनीतिक दल खुद ही करें आय &#8211; संपत्ति का खुलासा</title>
		<link>https://blog.adr.cramat.in/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%af/</link>
		<comments>https://blog.adr.cramat.in/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%af/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 14 Sep 2020 11:27:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Prof. Trilochan Sastry]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Recent Posts]]></category>
		<category><![CDATA[Democracy]]></category>
		<category><![CDATA[Elections]]></category>
		<category><![CDATA[चुनावी फंडिंग]]></category>
		<category><![CDATA[फंडिंग]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीतिक]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीतिक पार्टियों]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.adr.cramat.in/?p=1176</guid>
		<description><![CDATA[पिछले 15 वर्षों से राजनीतिक दलों की भरसक कोशिश रही है कि मतदाताओं को चुनावी फंडिंग के बारे में पता न चले लोकतंत्र में राजनीति और चुनावों में पैसे की भूमिका बढ़ती जा रही है। कई रिपोर्टों में सामने आया कि 2019 के चुनावों में अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से ज्यादा पैसा खर्च हुआ। इससे लोकतंत्र, [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पिछले 15 वर्षों से राजनीतिक दलों की भरसक कोशिश रही है कि मतदाताओं को चुनावी फंडिंग के बारे में पता न चले</strong></p>
<p>लोकतंत्र में राजनीति और चुनावों में पैसे की भूमिका बढ़ती जा रही है। कई रिपोर्टों में सामने आया कि 2019 के चुनावों में अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव से ज्यादा पैसा खर्च हुआ। इससे लोकतंत्र, चुनाव और नागरिकों पर क्या प्रभाव पड़ता है, वह जानने के लिए चुनावों के तीन महत्वपूर्ण घटक मतदाता, राजनीतिक दल और चुनावों में चंदा देने वालों के उद्देश्यों को समझना होगा। मतदाता सुशासन चाहते है। वे चाहते है कि कर के रूप में वे सरकार को जो पैसा देते हैं, उसका उपयोग सरकार नीति निर्माण और उन सेवाओं की बेहतरी के लिए करें।</p>
<p>राजनीतिक दलों का सत्ता में आना ही लक्ष्य होता है। जो लोग चंदा देते है, वे चाहते हैं कि जीतने के बाद उन्हें फायदा मिले। चंदा देने वाले लोग या तो किसी प्रकार की कानूनी जांच से बचे रहने के इरादे से चंदा देते हैं या वे कहते है कि पार्टियों ने उनसे जोर जबरदस्ती से चंदा लिया है। कुछ ही ऐसे है, जो जन कल्याण के कार्यों के लिए पार्टी को चंदा देते है। कुछ प्रतिष्ठित एजेंसियों ने सार्वजनिक स्तर पर जो आंकड़े उपलब्ध करवाए हैं, उनसे ज्ञात होता हैं कि 2019 के लोकसभा चुनावों में 50 हजार करोड़ रूपए से ज्यादा खर्चा हुआ था। सवाल है कि ये पैसा आता कहां से है ? राष्ट्रिय दलों द्वारा आधिकारिक तौर पर घोषित आय का आकलन करें तो पाएंगे कि 2004 से लेकर 2019 के बीच सभी राजनीतिक दलों की कुल आय 11 हजार करोड़ रूपए ही थी, फिर बाकि खर्च कैसे मैनेज हुआ ? राजनीतिक पार्टियां सिर्फ और सिर्फ अगले चुनाव के लिए चंदा जुटाने में लगी रहती हैं।</p>
<p>मौजूदा स्थिति को तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहला, राजनीतिक दलों द्वारा बताए गए चंदा उगाही के आंकड़ों में वृद्धि देखी गई। 2013-14 के आम चुनाव से पहले यह राशि 1,500 करोड़ से थोड़ी ज्यादा थी। 2018-19  तक ये 6,400 करोड़ हो गई। कुछ पैसा अघोषित भी हो सकता है। दूसरा, लोकसभा में आपराधिक पृष्ठभूमि के सांसदों की संख्या 2009 की 21 से 2019 में 43 फीसदी हो गई। तीसरा, आपराधिक रिकॉर्ड वाले धनी उम्मीदवारों के चुनाव जीतने की संभावना मध्यमवर्गीय ईमानदार उम्मीदवारों के मुकाबले ज्यादा होती है।</p>
<p>अन्य देशों में राजनीतिक दलों की फंडिंग को लेकर अधिक पारदर्शिता होती है। देश के कुछ कॉर्पोरेट हाउस अक्सर जांच के घेरे में रहते है और वे राजनीतिक पार्टियों के भी करीबी हैं। ऐसे आरोप भी लगते है कि पार्टियां इन व्यावसायिक घरानों को फायदा पहुंचाती है। चूंकि पुलिस और सीबीआई राजनीतिक दलों के प्रभाव में होते है। इसलिए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होने की संभावना भी नगण्य रह जाती है। इस सम्पूर्ण &#8216;व्यवस्था&#8217; में लोक कल्याण की नीतियां और बजट आवंटन भी प्रभावित होता है। सामाजिक क्षेत्र के व्यय में कटौती हो जाती है। इस बीच, ब्याज दरों में कटौती और आयकर में छूट संबंधी उपायों का फायदा भी कॉर्पोरेट घरानों को मिलता है। मान लीजिए, एक सेवानिवृत व्यक्ति ने यदि बचत के लिए फिक्स डिपोजिट करवा रखा है, तो ब्याज दर कम होने से उसका अच्छा खासा नुकसान हो जाएगा। दूसरी ओर कर्ज में डूबे व्यावसायिक घरानों को ब्याज दर कम होते ही लाखों का फायदा हो सकता है।</p>
<p>पिछले 15 वर्षों से राजनीतिक दलों की भरसक कोशिश रही है कि मतदाताओं को चुनावी फंडिंग के बारे में पता न चले। चुनावी बॉन्ड इसी कोशिश का व्यापक रूप है। स्वस्थ लोकतंत्र का तकाजा है कि राजनीतिक दल स्वत: प्रेरणा से अपनी आय और संपत्ति का सही ब्यौरा सार्वजनिक करें और विश्व के समक्ष मिसाल कायम करें।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://blog.adr.cramat.in/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%a6%e0%a4%b2-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%af/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>क्या निर्वाचन आयोग की चिट्ठी का असर राजनीतिक पार्टियों के ऊपर होगा ?</title>
		<link>https://blog.adr.cramat.in/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%a8-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f/</link>
		<comments>https://blog.adr.cramat.in/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%a8-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 14 Sep 2020 10:02:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Rajiv Kumar]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Recent Posts]]></category>
		<category><![CDATA[Democracy]]></category>
		<category><![CDATA[उम्मीदवारों]]></category>
		<category><![CDATA[निर्वाचन]]></category>
		<category><![CDATA[पार्टियों]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीतिक]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीतिक पार्टियों]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://blog.adr.cramat.in/?p=1167</guid>
		<description><![CDATA[यह सर्वविदित है कि सर्वप्रथम राजनीतिक पार्टियां गंभीर अपराधों के आरोपित उम्मीदवारों को अपना उम्मीदवार घोषित करती है इसके बाद जनता उस उम्मीदवार को मजबूरन चुनती है, लेकिन, पिछले दिनों चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक पार्टियों को अपनी चिट्ठी में हिदायत करते हुए लिखा है कि वे वैसे उम्मीदवारों को प्रत्याशी नहीं बनाए, जिसके खिलाफ [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>यह सर्वविदित है कि सर्वप्रथम राजनीतिक पार्टियां गंभीर अपराधों के आरोपित उम्मीदवारों को अपना उम्मीदवार घोषित करती है इसके बाद जनता उस उम्मीदवार को मजबूरन चुनती है, लेकिन, पिछले दिनों चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक पार्टियों को अपनी चिट्ठी में हिदायत करते हुए लिखा है कि वे वैसे उम्मीदवारों को प्रत्याशी नहीं बनाए, जिसके खिलाफ मुकदमे लंबित है। नियमानुसार पार्टियों को समाचार पत्रों में बजाप्ता समाचार प्रकाशित कराना होगा। आयोग ने दलों को हिदायत करते हुए लिखा कि चुने जाने के 48 घंटे के उपरांत फॉर्मेट सी 7 में उसे समाचार पत्रों में सूचना देनी होगी। यह सूचना राज्य और राष्ट्रीय अख़बार में देनी होगी। साथ ही सूचना प्रकाशित करने के 72 घंटे के अंदर आयोग को फॉर्मेट सी 8 में बताना होगा। जिसमें प्रावधान है कि अगर कोई दल इस आदेश का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कंटेम्ट प्रोसीडिंग चलाई जाएगी।</p>
<p>आयोग ने चिट्ठी माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उसी आदेश के आलोक में लिखी है जिसमें न्यायालय ने पांच निर्देश दिए थे, ताकि मतदाता को वोटिंग से पहले प्रत्याशी की पृष्ठभूमि का पता चल सके। निर्देशानुसार प्रत्याशी को अपनी पृष्ठभूमि समाचार पत्र और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए तीन बार बतानी होगी। चुनाव आयोग के फॉर्म में मोटे अक्षरों में लिखना होगा कि उसके खिलाफ कितने आपराधिक मामले चल रहे हैं। उसे इस फॉर्म में हर पहलू की जानकारी देनी होगी। किसी भी सवाल को छोड़ा नहीं जा सकता। वह पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है तो उस मामले की जानकारी पार्टी को भी देनी होगी। पार्टी को अपने प्रत्याशियों को आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालनी होगी। ताकि वोटर नेता की पृष्ठभूमि से अनजान न रहे। गौरतलब है कि पिछले बार के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कोर्ट के आदेशों पर पूरी तरह अमल नहीं हो पाया। पुनः लोक सभा चुनाव 2019 में भी इसका पालन नहीं हो पाया। अब आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का अनुपालन होता है या नहीं तथा निर्वाचन आयोग की चिट्ठी का असर कितना होगा यह जल्द ही पता चल जाएगा। चुनाव आयोग ने भी चुनाव में भाग्य आजमा रहे उम्मीदवारों को चेतावनी देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान आपराधिक रिकॉर्ड के ब्योरे सहित विज्ञापन नहीं देने वाले उम्मीदवारों को अदालत की अवमानना की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही अपने प्रतिद्वेंदियों के बारे में गलत आपराधिक रिकॉर्ड प्रकाशित करवाने वालों पर भ्रष्ट तरीके इस्तेमाल करने के आरोप में जुर्माना लग सकता है। चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रहे प्रत्याशियों को निर्वाचन आयोग ने यह चेतावनी भी दी है। मालूम हो कि 2010 में जहां 85 यानी 35 प्रतिशत विधायकों के ऊपर गंभीर मामले थे वही 2015 में 40 प्रतिशत यानी 98 विधायकों के ऊपर गंभीर मामले लंबित है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित!</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>https://blog.adr.cramat.in/%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%a8-%e0%a4%86%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%9f/feed/</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>
