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	<title>ADR Speaks &#187; Rajiv Kumar</title>
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		<title>वोट बहिष्कार के आगे और &#8216;नोटा&#8217; में समाधान ढूंढ़ना होगा</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Sep 2020 10:07:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Rajiv Kumar]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[बिहार के लक्खीसराय अंतर्गत कई गांवों के लोगों को गर्मी के दिनों में कई किलोमीटर दूर से पेयजल ढो कर लाना पड़ता है। चार सौ घरों के मझियांवा में बारह सौ मतदाता हैं, जो पिछले लोकसभा चुनाव में आज़ादी के बाद मिले सबसे बड़े और क्रांतिकारी वोट के अधिकार का बहिष्कार कर दिया, लेकिन उनकी [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>बिहार के लक्खीसराय अंतर्गत कई गांवों के लोगों को गर्मी के दिनों में कई किलोमीटर दूर से पेयजल ढो कर लाना पड़ता है। चार सौ घरों के मझियांवा में बारह सौ मतदाता हैं, जो पिछले लोकसभा चुनाव में आज़ादी के बाद मिले सबसे बड़े और क्रांतिकारी वोट के अधिकार का बहिष्कार कर दिया, लेकिन उनकी मांगे देश की आज़ादी के बीते 74 वर्षों में पूरी नहीं हो पाई। आज भी उनके लिए पेयजल जीवन ही सबसे बड़ी हसरत है। बिहार के चुनाव में नक्सली संगठनों द्वारा वोट बहिष्कार की पुरानी परम्परा रही है। नक्सल प्रभाव वाले इलाकों में इसका प्रभाव भी दिखता था, लेकिन आज़ादी के 66 वर्षों के बाद अमोघ अस्त्र के रूप में &#8216;नोटा&#8217; मिला है, किन्तु लोकतंत्र के सफर में हम आज जीवन की नैसर्गिक जरूरतों को पूरा करने के लिए &#8220;नोटा&#8221; के प्रयोग के आगे कुछ भी सोच पाने में असमर्थ  साबित हो रहे हैं। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है।  नोटा के अस्तित्व में आने के पीछे यही दर्शन रहा है। भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण फैंसला 27 सितम्बर 2013 को उस समय सामने आया जब सर्वोच्च न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) द्वारा दाखिल की गयी एक जनहित याचिका का निपटारा करते हुए भारत के निर्वाचन आयोग को आदेश दिया कि वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में उपरोक्त में से कोई नहीं (नोटा) का बटन लगाये ताकि जो मतदाता चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में से किसी को भी वोट न देना चाहते हो वह अपना वोट गोपनीयता बनाये रखते हुए अपने विकल्प का इस्तेमाल कर सके।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>2019 के लोक सभा में एक तिहाई सीटों पर आठ लाख से अधिक वोट मिले। सबसे अधिक जहानाबाद में 27 हज़ार 683 बार नोटा बटन दबा जहानाबाद में। &#8216;नोटा&#8217; ने जहानाबाद के चुनावी नतीजों को प्रभावित किया। इस सीट पर हार जीत का अंतर महज 1751 वोटों का है, जबकि यहाँ नोटा को 27 हज़ार 683 मत मिले। देश भर में लोक सभा की कई सीटें ऐसी रही जहां पर जीत का अंतर नोटा को मिले वोटों से भी कम रहा। करीब दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर प्रत्याशियों को नोटा की वजह से हार झेलनी पड़ी। भारत 2014 से भारत में नोटा को अपनाया गया। पहली बार 15 लाख से ज्यादा वोट नोटा को आया था। 16 वीं बिहार विधानसभा के लिए चुनाव में नोटा का जबरदस्त प्रभाव देखा गया। इसने 23 सीटों पर सीधे तौर पर परिणाम को प्रभावित किया। इन 23 सीटों पर जितने मतों के अंतर से जीत हासिल हुई। उससे कही अधिक नोटा के पक्ष में बटन दबे। यह चुनाव इस मायनों में भी रहा क्योंकि मतदाताओं  ने कई पार्टियों की तुलना में नोटा को ज्यादा वोट दिया।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>नोटा के तहत होना यह चाहिए कि नोटा को यदि चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में यदि सबसे अधिक मत नोटा को मिले तो वह चुनाव रद्द हो जाना चाहिए। उसके बाद पुनः चुनाव करवाए जाने चाहिए जिसमें पूर्व में खड़े उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। यानि पुनः नये उम्मीदवारों के साथ पुनर्मतदान कराये जाने चाहिए। नोटा भारत में नकारात्मक फीडबैक देने का काम करने लगा है, अब कुछ राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि भी नोटा को लेकर नकारात्मक माहौल बनाने में लगे हुए है या इसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर रहे है जो बिलकुल ही लोकतंत्र की अवधारणाओं की विरुद्ध है। हाल में महाराष्ट्र और हरियाणा स्टेट इलेक्शन कमीशन की पहलकदमी से नोटा के प्रति भरोसा जगा है। 6 नवंबर &#8211; 2018 को महाराष्ट्र में स्टेट इलेक्शन कमीशन ने एक ऑर्डर पास किया है कि नोटा को यदि बहुमत मिल जाता है तो पुनर्मतदान कराया जाएगा। 22 नवंबर &#8211; 18 को हरियाणा स्टेट इलेक्शन कमीशन ने भी यही निर्णय लिया। इसकी एक वजह थी कि महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में कई ऐसी सीटें थी जिसमें नोटा को बहुमत मिला था। पुणे के एक पंचायत में नोटा को 85 प्रतिशत वोट मिल गया। यही ऑर्डर यदि देश व्यापी हो जाए तो उम्मीद है देश में नोटा की प्रासंगिकता बढ़ जाएगी और वोट बहिष्कार की धारा को भी मुकाम मिल जाएगा।</p>
<pre id="tw-target-text" class="tw-data-text tw-text-large XcVN5d tw-ta" dir="ltr" data-placeholder="Translation"><span lang="hi">मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित</span></pre>
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		<title>क्या निर्वाचन आयोग की चिट्ठी का असर राजनीतिक पार्टियों के ऊपर होगा ?</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Sep 2020 10:02:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Rajiv Kumar]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[यह सर्वविदित है कि सर्वप्रथम राजनीतिक पार्टियां गंभीर अपराधों के आरोपित उम्मीदवारों को अपना उम्मीदवार घोषित करती है इसके बाद जनता उस उम्मीदवार को मजबूरन चुनती है, लेकिन, पिछले दिनों चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक पार्टियों को अपनी चिट्ठी में हिदायत करते हुए लिखा है कि वे वैसे उम्मीदवारों को प्रत्याशी नहीं बनाए, जिसके खिलाफ [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>यह सर्वविदित है कि सर्वप्रथम राजनीतिक पार्टियां गंभीर अपराधों के आरोपित उम्मीदवारों को अपना उम्मीदवार घोषित करती है इसके बाद जनता उस उम्मीदवार को मजबूरन चुनती है, लेकिन, पिछले दिनों चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक पार्टियों को अपनी चिट्ठी में हिदायत करते हुए लिखा है कि वे वैसे उम्मीदवारों को प्रत्याशी नहीं बनाए, जिसके खिलाफ मुकदमे लंबित है। नियमानुसार पार्टियों को समाचार पत्रों में बजाप्ता समाचार प्रकाशित कराना होगा। आयोग ने दलों को हिदायत करते हुए लिखा कि चुने जाने के 48 घंटे के उपरांत फॉर्मेट सी 7 में उसे समाचार पत्रों में सूचना देनी होगी। यह सूचना राज्य और राष्ट्रीय अख़बार में देनी होगी। साथ ही सूचना प्रकाशित करने के 72 घंटे के अंदर आयोग को फॉर्मेट सी 8 में बताना होगा। जिसमें प्रावधान है कि अगर कोई दल इस आदेश का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कंटेम्ट प्रोसीडिंग चलाई जाएगी।</p>
<p>आयोग ने चिट्ठी माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उसी आदेश के आलोक में लिखी है जिसमें न्यायालय ने पांच निर्देश दिए थे, ताकि मतदाता को वोटिंग से पहले प्रत्याशी की पृष्ठभूमि का पता चल सके। निर्देशानुसार प्रत्याशी को अपनी पृष्ठभूमि समाचार पत्र और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए तीन बार बतानी होगी। चुनाव आयोग के फॉर्म में मोटे अक्षरों में लिखना होगा कि उसके खिलाफ कितने आपराधिक मामले चल रहे हैं। उसे इस फॉर्म में हर पहलू की जानकारी देनी होगी। किसी भी सवाल को छोड़ा नहीं जा सकता। वह पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है तो उस मामले की जानकारी पार्टी को भी देनी होगी। पार्टी को अपने प्रत्याशियों को आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालनी होगी। ताकि वोटर नेता की पृष्ठभूमि से अनजान न रहे। गौरतलब है कि पिछले बार के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कोर्ट के आदेशों पर पूरी तरह अमल नहीं हो पाया। पुनः लोक सभा चुनाव 2019 में भी इसका पालन नहीं हो पाया। अब आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का अनुपालन होता है या नहीं तथा निर्वाचन आयोग की चिट्ठी का असर कितना होगा यह जल्द ही पता चल जाएगा। चुनाव आयोग ने भी चुनाव में भाग्य आजमा रहे उम्मीदवारों को चेतावनी देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान आपराधिक रिकॉर्ड के ब्योरे सहित विज्ञापन नहीं देने वाले उम्मीदवारों को अदालत की अवमानना की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही अपने प्रतिद्वेंदियों के बारे में गलत आपराधिक रिकॉर्ड प्रकाशित करवाने वालों पर भ्रष्ट तरीके इस्तेमाल करने के आरोप में जुर्माना लग सकता है। चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रहे प्रत्याशियों को निर्वाचन आयोग ने यह चेतावनी भी दी है। मालूम हो कि 2010 में जहां 85 यानी 35 प्रतिशत विधायकों के ऊपर गंभीर मामले थे वही 2015 में 40 प्रतिशत यानी 98 विधायकों के ऊपर गंभीर मामले लंबित है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित!</p>
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		<title>क्या आय के स्रोतों के खुलासे से राजनीति में आ पाएगी शुचिता ?</title>
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		<pubDate>Wed, 09 Sep 2020 11:21:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Rajiv Kumar]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[चुनाव प्रक्रिया में सुधार एवं राजनीति में शुचिता के लिए उच्चतम न्यायालय ने पिछले दिनों एक ऐतिहासिक व अहम फैंसला सुनाया था। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सांसद एवं विधायकों की संपत्ति इतनी कैसे बढ़ जाती है ? यह जनता को जानने का अधिकार है। फैंसले के मुताबिक उम्मीदवारों [&#8230;]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>चुनाव प्रक्रिया में सुधार एवं राजनीति में शुचिता के लिए उच्चतम न्यायालय ने पिछले दिनों एक ऐतिहासिक व अहम फैंसला सुनाया था। न्यायालय ने याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सांसद एवं विधायकों की संपत्ति इतनी कैसे बढ़ जाती है ? यह जनता को जानने का अधिकार है। फैंसले के मुताबिक उम्मीदवारों को अब स्वयं, पत्नी और आश्रितों की संपत्ति के साथ आय का स्रोत भी बताना आवश्यक हो जाएगा। फैंसला के तहत अब से नामांकन परची में एक कॉलम होगा जिसमें आश्रितों की कमाई के स्रोतों को भी दर्शाना होगा। अब वे चल &#8211; अचल संपत्ति के साथ ही अपने तथा अपने आश्रितों के आय के स्रोतों का भी उल्लेख करेंगे। साथ ही पिछले पांच वर्षों में कुल आय को वर्ष वार दर्शाना भी आवश्यक हो जाएगा। चुनाव आयोग को यह जानकारी देनी होगी कि उन्हें या उनके आश्रितों के किसी सदस्य की कंपनी को कोई सरकारी टेंडर मिला है या नहीं। यह व्यवस्था अब लोकसभा, राज्य सभा एवं अगले बिहार विधानसभा के साथ पंचायत के चुनाव में भी लागू होगा।</p>
<p>2014 के लोक सभा चुनाव में एडीआर द्वारा उम्मीदवारों के हलफनामों के विश्लेषण के अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि 113 सांसदों की संपत्ति में सौ गुणा, 26 सांसदों की संपत्ति में पांच सौ गुणा वृद्धि हुई है। इनमें 113 सांसदों ने अपना पेशा बतौर समाज सेवा, राजनीति एवं सामाजिक कार्य बताया था। आश्रितों में आठ की पत्नियां गृहिणी थी, लेकिन उनकी संपत्ति करोड़ों में थी। जाहिर है ये सभी आय के स्रोत नहीं हो सकते है। बिहार इलेक्शन वॉच के अध्ययन का भी हवाला दिया जा सकता है कि पिछले विधानसभा में निर्वाचित विधायकों की संपत्ति से उनके आश्रितों की संपत्ति पचास प्रतिशत से अधिक थी। 2015 के विधानसभा में यह भी देखने को मिला कि 43 विधानसभा सदस्यों की पत्नियों की संपत्ति में पचास प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गयी। एक विधायक की संपत्ति दो लाख थी वही उनके आश्रित एक करोड़ के स्वामी थे। यानी आश्रितों की संपत्ति में 97.87 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। इस क्रम में 43 ऐसे माननीय है जिनकी संपत्ति अपने आश्रितों से भी कम है यानी समाज सेवा के नाम पर राजनीति कर रहे विधानसभा सदस्यों को अपने आश्रितों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। याचिका कर्ता का यह कहना है कि अब जनता को अपने प्रतिनिधियों को पकड़ना आसान हो जाएगा कि उनकी संपत्ति पिछले कुछ सालों में कितनी बढ़ गई है और उसके आय के जायज स्रोत क्या है ? मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि आखिर इनकी संपत्ति दिन &#8211; दूनी रात चौगुनी कैसे बढ़ रही है। अदालत के आदेश के तहत उम्मीदवारों को न सिर्फ अपनी आय के स्रोत बताने होंगे बल्कि अपनी पत्नी, बेटा, बहु, बेटी दामाद की आय के साथ उनके स्रोत की भी घोषणा करनी होगी।  सर्वविदित है कि बेहिसाब संपत्ति की घोषणा करने के साथ ही यह गोपनीय रहा करता था कि उनकी बेहिसाब संपत्ति का आखिर स्रोत क्या है ? गौर करने वाली बात है कि कमोबेश चुनावों में सभी उम्मीदवारों के द्वारा समाज सेवा या राजनीति को बतौर पेशा बताया जाता है। आखिर राजनीति या समाज सेवा कोई पेशा नहीं होता तो फिर उनकी अकूत संपत्ति का राज आमलोगों को समझ में नहीं आ पाता है ? किसी भी सांसद या विधायक के आय से अधिक संपत्ति माफिया राज को रास्ता माना जाता है। जिसका असर राजनेताओं के भ्रष्टाचार पर पड़ता है।</p>
<p>ऐसा देखा जा रहा है कि अपने परिजनों के नाम पर ऐसे राजनेता कई पीढ़ियों के लिए बेहिसाब संपत्ति बना लेते है वही दूसरी ओर गरीब जनता की सेहत में सालों कोई परिवर्तन नहीं आ पाता। इन माननीयों की संपत्ति और आय के अंर्तसंबन्धों को समझने के लिए 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में 160 ऐसे उम्मीदवारों की आय का विश्लेषण किया गया जिनकी 2010 में संपत्ति 84.41 लाख थी, लेकिन 2015 में उनकी संपत्ति में औसतन 199 प्रतिशत वृद्धि देखी गयी यानि औसतन 2.57 लाख। इन पांच सालों में 1.71 करोड़ वृद्धि हुई। इनमें पांच ऐसे नाम है जिनकी संपत्ति 553 प्रतिशत, 480 प्रतिशत, 354 प्रतिशत, 279 प्रतिशत और 210 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गयी। विधानसभा के साथ लोकसभा, राज्य सभा एवं प्रदेश के सर्वोच्च पदों पर आसीन राजनेताओं की स्थिति कमोबेश समान ही देखी गयी है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<pre id="tw-target-text" class="tw-data-text tw-text-large XcVN5d tw-ta" dir="ltr" data-placeholder="Translation"><span lang="hi">मूल रूप से प्रभात खबर में प्रकाशित!</span></pre>
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